Indian Railways News => Topic started by RailXpert on Jun 15, 2013 - 12:01:53 PM


Title - दो जोन के पेंच में रेलवे की साख पर बट्टा
Posted by : RailXpert on Jun 15, 2013 - 12:01:53 PM

रेलवे का बहुचर्चित स्लोगन 'यात्रियों की सेवा मुस्कान के साथ' शुक्रवार की सुबह यात्रियों के लिए यहां तब भारी पड़ गया जब सोनपुर रेल डिविजन के छपरा-सोनपुर रेल सेक्शन के बीच लंबी दूरी की एक ट्रेन के इंजन फेल होने के बाद उसका पावर बदलने का मामला दो जोन और डिविजन के पेंच में अटक गया। पूर्वोत्तर रेलवे के वाराणसी और पूर्व मध्य रेल के सोनपुर रेल डिविजन के बीच लगभग तीन घंटे तक चली लंबी खींचतान के बाद आखिरकार वाराणसी रेल डिविजन ने पावर बदलकर ट्रेन रवाना तो कर दिया परन्तु यात्रियों की नजर में अधिकारियों की लचर कार्यशैली ने रेलवे की साख पर बट्टा लगा दिया।
शुक्रवार की सुबह आठ बजे के बाद छपरा जंक्शन से रवाना होने के बाद नई दिल्ली से दरभंगा जाने वाली 12566 डाउन बिहार संपर्क क्रांति सुपरफास्ट ट्रेन का इंजन गोल्डेनगंज स्टेशन के निकट अचानक फेल हो गया। सोनपुर रेल डिविजन के अंतर्गत उक्त रेल सेक्शन के होने की वजह से इसकी सूचना सबसे पहले सोनपुर रेल डिविजन को दी गयी। हालांकि आश्वासन तो यह दिया गया कि जल्द ही इंजन भेजा जायेगा। परन्तु छपरा से महज पांच-छह किलोमीटर की दूरी पर फेल होकर खड़ी इंजन के बदले दूसरा इंजन उपलब्ध कराने के लिए दो डिविजन और रेलवे जोन के बीच लंबी खींचतान शुरू हो गयी। इस बीच भीषण गर्मी में लगभग तीन घंटे से अधिक समय तक खड़ी ट्रेन के यात्री बुरी तरह से बेहाल हो गये। सबसे मुसीबत तो वातानुकुलित श्रेणी में यात्रा करने वाले यात्रियों की हो रही थी। एसी बंद होने के बाद डिब्बे में मानों आग बरसने लगा हो। बावजूद इसके इस आस में कि शायद तुरंत इंजन लगाकर ट्रेन चला दी जाए, यात्रियों ने काफी धैर्य का परिचय दिया और वे सिर्फ रेलवे को मन ही मन कोसते रहे। उनके सामने अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाने के सिवा और कोई रास्ता भी नहीं था। हैरत करने वाली बात तो यह है कि सोनपुर से रेलवे के एक बड़े अधिकारी की सैलून उक्त ट्रेन में लगाकर चलाई जानी थी परन्तु वहां के अधिकारियों ने साहब की सैलून यह बताकर कि बिहार संपर्क का इंजन फेल हो चुका है, बरौनी-ग्वालियर एक्सप्रेस में लगवा दी। जिससे साहब अपने गंतव्य के लिए रवाना हो गये। इस बीच लगातार दोनों रेल डिविजन के बीच अतिरिक्त इंजन के नहीं होने का रोना रोया जाता रहा। ट्रेन वहां घंटों खड़ी रही। मगर ट्रेन पर सवार यात्री ही सिर्फ बेहाल थे, ऐसी बात नहीं उस ट्रेन की प्रतीक्षा में आगे के विभिन्न रेलवे स्टेशन पर खड़े यात्रियों का धैर्य भी जवाब दे रहा था। मगर वहां ट्रेन के पावर फेल होने के बारे में यात्रियों को कोई जानकारी नहीं दी जा रही थी। तमाम मशक्कत के बाद भले ही वाराणसी रेल डिविजन ने इंजन भेजकर ट्रेन वहां से आगे बढ़ाने में महती भूमिका निभा दी हो परन्तु इस पूरी घटनाक्रम ने रेलवे की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाकर रख दिया है। यहां बताते चलें कि जिस जगह पर ट्रेन का इंजन फेल हुआ वह इलाका भी काफी संवेदनशील माना जाता है तथा नक्सली हमले भी चुके हैं। महज अठारह घंटे पहले जमुई में ट्रेन पर नक्सली हमला किये जाने की घटना से सबक लेना तो दूर टाल-मटोल रवैये की वजह से यात्रियों की जान खतरे में पड़ सकती है, ऐसा सोचने की भी किसी ने जहमत नहीं उठायी। इस बीच यात्रियों को चाहे जो भी परेशानी झेलनी पड़ी इसके लिए आखिर जवाबदेह कौन है? सोनपुर से गोल्डेनगंज की दूरी तय करने में इंजन को 40 मिनट समय लगते हैं बावजूद इंजन बदलने में इतनी देर आखिर कैसे लगी। अगर फैसला लेने में देर हुई तो इसके लिए दोषी कौन है? अगर वाराणसी रेल डिविजन से ही पावर मंगाया जाना था तो पहले क्यों नहीं मंगाया गया? ऐसे कई सवाल हैं जो रेलवे की व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा सकते हैं। मगर इन सारी बातों के बावजूद हैरत करने वाली बात यह है कि इस बाबत पूछने पर सोनपुर रेल डिविजन के डीएमई पावर का कहना है कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं।