Indian Railways News => Topic started by nikhilndls on Aug 01, 2012 - 18:20:40 PM


Title - बरबाडीह-अम्बिकापुर रेल परियोजना की फाइल से हटी धूल= मुम्बई से कोलकाता की दूरी इस मार्ग से 250 मील या
Posted by : nikhilndls on Aug 01, 2012 - 18:20:40 PM

लगभग सत्तर वर्ष से धूल फांक रही बरबाडीह-अम्बिकापुर रेल परियोजना की फाइल पर से अब धूल हटती नजर आ रही है और इसका श्रेय चतरा सांसद इंदर सिंह नामधारी के खाते में जाता है। उनके अथक प्रयास से योजना आयोग ने इस रेल परियोजना को सशर्त सैध्दांतिक मंजूरी प्रदान कर दी हैं। पलामू प्रमंडल के लातेहार जिले के बरबाडीह से छतीसगढ़ के अम्बिकापुर-चिरमिरी रेल परियोजना वर्ष 1940 से जब कभी भी फाइलों से बाहर निकली, तुरंत उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यह पहला मौका है जब इसकी फाइल योजना आयोग तक पहुंची है और योजना आयोग ने इसे सैध्दांतिक स्वीकृति प्रदान कर दी है। योजना आयोग से इस चिरलंबित रेल परियोजना को मंजूरी मिलने से पलामू के लोगों की उम्मीदें फिर से जग गयी हैं। दरअसल, श्री नामधारी ने चतरा से सांसद निर्वाचित होते ही इस रेल परियोजना को पूरा कराने की दिशा में लगातार अपना प्रयास जारी रखा। कभी रेल मंत्रालय से उन्होंने इसके लिए गुहार लगायी तो कभी संसद में आवाज उठायी। व्यक्तिगत तौर पर विभिन्न विभागों के साथ इस सिलसिले में वह लगातार पत्राचार करते रहे। इसी का नतीजा है कि इस रेल परियोजना की फाइल योजना आयोग तक पहुंची और इस पर काम चालू होने का मार्ग प्रशस्त हुआ। श्री नामधारी ने गत 27 मार्च को योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया को पत्र लिखकर इस परियोजना की महता समझायी थी और इस दिशा में सार्थक पहल की अपेक्षा की थी। श्री अहलूवालिया ने नामधारी को पत्र लिखकर इस रेल परियोजना को सैध्दांतिक मंजूरी देने की बात कही है। हालांकि उन्होंने इसके लिए दो शर्तें भी रखी हैं। पहली शर्त है कि परियोजना के लिए जमीन मुफ्त देना होगा और दूसरी शर्त है- सीसीएल जैसी कंपनियों को इस परियोजना के निर्माण में अपनी सहभागिता निभानी होगी। दोनों ही शर्तों को पूरा करना मुश्किल नहीं हैं।
श्री नामधारी ने कहते हैं कि इस रेल परियोजना पर काफी काम हो चुका है, जिससे प्रमाणित होता है कि जमीन अधिग्रहण का मामला लंबित नहीं है। दूसरी शर्त की पूर्ति के लिए श्री नामधारी ने पुन: योजना आयोग को पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि वह अपने स्तर से सीसीएल जैसी कंपनी को सहभागिता निभाने के लिए प्रेरित करें। श्री नामधारी ने उम्मीद जतायी है कि जल्द ही इस परियोजना पर काम शुरू हो जायेगा।
इस योजना के बारे में बताया जाता है कि सन 1936 में द्वितीय युध्दकाल के समय सैन्य शक्ति और युध्द सामग्री के शीघ्र एवं व्यवस्थित परिवहन के दृष्टिकोण से अंग्रेज सेना मुख्यालय ने जबलपुर और रांची को जोड़ने की सिफारिश करते हुए इस मार्ग का सर्वेक्षण कराया और पाया कि जबलपुर से कटनी, अनूपपुर, चिरमिरी रेलवे लाइन को करंजी, प्रतापपुर, होते हुए यदि गढ़वा रोड-बरबाडीह-रांची रेल लाइन से जोड़ दिया जाये तो मुम्बई से कोलकाता की दूरी इस मार्ग से 250 मील यानि करीब 400 किलोमीटर कम हो जायेगी।
द्वितीय विश्वयुध्द प्रारंभ हो जाने से इस योजना पर त्वरित गति से काम शुरू नहीं किया जा सका, फिर भी प्रथम चरण में बरबाडीह से कुटकू, भंडरिया, बड़गढ़ से रामनगर होते हुए सरनाडीह (बलरामपुर) तक इसके लिए भूमि का अधिग्रहण कर लिया गया था। इतना ही नहीं बड़गढ़ से भंडरिया, कुटकू तक रेल पातें भी बिछा दी गयी थीं। बीच-बीच में स्टेशनों का निर्माण भी शुरू हो गया था और नदी-नालों पर पुल निर्माण का कार्य भी शुरू कर दिया गया लेकिन 1945 में द्वितीय विश्वयुध्द समाप्त होते ही यह स्पष्ट होने लगा कि अंग्रेजों को हर हाल में भारत छोड़ना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में अंग्रेज सरकार ने अन्य निर्माण कार्यों की तरह इस रेल लाइन का निर्माण कार्य भी बंद कर दिया।
जानकार सूत्रों के अनुसार देश को आजादी मिलने के पश्चात वर्ष 1950 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पुन: इस परियोजना पर काम प्रारंभ कराया था, लेकिन अचानक इस परियोजना को बंद कर दिया गया। इस निर्णय का कड़ा विरोध डा. राम मनोहर लोहिया ने किया था और मांग की थी कि इस परियोजना पर जल्द काम लगाये जाये। बाद में भी कई बार संसद में समाजवादी विचारधारा के पोषक सांसदों ने आवाज उठायी लेकिन सरकार का टालमटोल का रवैया अपनाती रही। चर्चा है कि अगर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया के कार्यकाल में इस परियोजना पर काम चालू हो गया तो उनका कद काफी बढ़ जायेगा। इसके अलावा श्री नामधारी की लोकप्रियता को भी चार चांद लग जायेगा। हालांकि उनसे पहले पूर्व सांसद जोरावर राम और समाजवादी नेता पूरनचंद इसके लिए हाथ-पैर मारकर थक चूके हैं। अब श्री नामधारी ने इस परियोजना को चर्चे में ला दिया है। अब देखना यह है कि कि वह इस चिरलंबित रेल परियोजना को पूरा करा पाने की दिशा में कितने सफल होते हैं। योजना के पूरा हो जाने पर आदिवास बाहुल्य क्षेत्रों की आर्थिक-सामाजिक दशा में सुधार होना तय है।