| ‘बीमार’ हैं रेलवे की स्वास्थ्य परियोजनाएं by Mafia on 23 February, 2013 - 04:00 PM | ||
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Mafia | ‘बीमार’ हैं रेलवे की स्वास्थ्य परियोजनाएं on 23 February, 2013 - 04:00 PM | |
रेल बजट की घोषणाएं कितनी कागजी हैं, इसका अंदाजा नए रेलवे मेडिकल एवं नर्सिंग कालेजों की स्थापना के दावों से लगाया जा सकता है. चार वर्ष पहले तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने अपने बजट भाषण में 18 मेडिकल एवं सात नर्सिंग कालेज खोलने की घोषणा की थी मगर इनमें से एक भी मेडिकल कालेज की अब तक बुनियाद नहीं रखी गई. अलबत्ता कोलकता में रेलवे नर्सिंग कालेज जरूर बन रहा है. जाहिर है कि इसका खमियाजा देश भर में फैले हजारों रेलवे कर्मचारियों को भुगतना पड. रहा है. चार साल में भी नहीं पड़ सकी मेडिकल कालेज की नींव सार्वजनिक- निजी भागीदारी (पीपीपी) के तहत स्थापित होने वाले 18 में से पांच मेडिकल कालेजों की स्थापना के लिए सलाहकार भर नियुक्त हुए हैं. जिन मेडिकल कालेजों के लिए सलाहकार नियुक्त किए गए हैं, उनमें लखनऊ, खड़गपुर, गुवाहाटी, चेन्नई एवं सकिंदराबाद हैं, जबकि मैसूर में भूमि विवाद ने रेलवे मेडिकल कालेज की स्थापना लटका दी है. तीन जुलाई 2009 में तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जब संसद में वित्त वर्ष 2009-10 का रेल बजट पेश किया था तो रेल कर्मचारियों एवं उनके परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए देशभर में 18 मेडिकल एवं 7 नर्सिंग कालेज खोलने की घोषणा की थी. मेडिकल कालेज खुलने से रेलकर्मियों के बच्चों को स्वास्थ्य शिक्षा के लिए दाखिले में मिलेगी प्राथमिकता ये कालेज सार्वजनिक-निजी भागीदारी योजना के तहत खुलने थे. इसमें रेलवे पर कोई आर्थिक भार भी नहीं पड़ना था, क्योंकि रेलवे को केवल जमीन देनी थी. उस पर मेडिकल कालेज एवं छात्रावास का प्रबंध निजी क्षेत्र को करना था. अस्पताल के नाम पर रेलवे के अपने अस्पतालों को इन मेडिकल एवं नर्सिंग कालेजों से जोड़ना था. इन कालेजों का सबसे ज्यादा लाभ रेलकर्मियों के बच्चों को मिलना था क्योंकि कालेजों में प्रवेश के दौरान उनके बच्चों को आरक्षण देने का वायदा किया गया था. रेलवे अस्पतालों को भी उक्त योजना में लाभ मिलना था, क्योंकि वर्तमान में रेलवे अस्पतालों में रेजिडेंट डाक्टरों व नर्सिंग स्टाफ का घोर आभाव है. वर्ष 2009-10 के रेल बजट के मुताबिक यह मेडिकल कालेज चेन्नई, हैदराबाद, बिलासपुर, लखनऊ, बारासात, भुवनेर, मैसूर, खड़गपुर, गुवाहाटी, डिब्रूगढ़, जोधपुर, नागपुर, अहमदाबाद, भोपाल, जम्मू, त्रिवेंद्रम, कोलकता एवं एक अन्य स्थान पर खुलने थे जबकि दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई, सकिंदराबाद एवं जबलपुर में रेलवे नर्सिंग कालेजों की स्थापना होनी थी. नर्सिंग कालेजों में अभी तक केवल कोलकाता में काम शुरू हुआ है जबकि दिल्ली, लखनऊ एवं जबलपुर में सलाहकार भर नियुक्त हो पाए हैं. इसका कोई ठोस जवाब रेलवे बोर्ड के पास नहीं है. उसके अधिकारियों का कहना है कि इसमें मेडिकल काउंसिल के सख्त नियम आड़े आ रहे हैं. उनके कारण निजी क्षेत्र के निवेशक रेलवे के पास आने में कतरा रहे हैं. यूं तो देश में निजी मेडिकल कालेज खोलने वालों की लंबी कतार है मगर उनके पास मेडिकल काउंसिल द्वारा तय की गई मात्रा में जमीन नहीं है. उधर रेलवे के पास के 20 एकड़ क्षेत्रफल के 41 भूखंड हैं. संशोधित नियमों के मुताबिक मेडिकल कालेज की स्थापना के लिए कम से कम 15 एकड़ जमीन चाहिए. जमीन विवाद के चलते मैसूर रेलवे मेडिकल कालेज की स्थापना अभी तक नहीं हो पाई है. रेलवे बोर्ड इस देरी से यह कहकर भी पल्ला झाड. रहा है कि जमीन का विवाद सुलझ भी जाए तो मेडिकल काउंसिल अस्पताल और उसकी क्षमता को लेकर नया विवाद खड़ा कर सकती है. जिन पांच मेडिकल कालेजों के लिए सलाहकार नियुक्त हुए है वहां के अस्पतालों की क्षमता क्रमश: लखनऊ-275 बेड, खड़गपुर-30 बेड, गुवाहाटी-317 बेड, चेन्नई-500 बेड एवं सकिंदराबाद-300 बेड है. उधर मेडिकल काउंसिल प्रत्येक अस्पताल की बेड क्षमता कम से कम 500 होने पर जोर दे रही है. ऐसे में फिलहाल चेन्नई में ही रेलवे मेडिकल कालेज की स्थापना का रास्ता साफ नजर आ रहा है. | ||